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Wednesday, 20 March 2013

हुई लाल -पीली सखी, पी ली मीठी भांग-

सन्देश: 31 मार्च तक ब्लॉग जगत से दूर हूँ-रविकर 
शुभ-होली
दोहे 

रंग रँगीला दे जमा, रँगरसिया रंगरूट |
रंग-महल रँगरेलियाँ, *फगुहारा ले लूट ||
*फगुआ गाने वाला पुरुष -
फ़गुआना फब फब्तियां, फन फ़नकार फनिंद |
रंग भंग भी ढंग से, नाचे गाये हिन्द ||

हुई लाल -पीली सखी, पी ली मीठी भांग |
  अँगिया रँगिया रँग गया, रंगत में अंगांग ||


देख पनीले दृश्य को, छुपे शिशिर हेमंत ।
आँख गुलाबी दिख रही, पी ले तनि श्रीमंत ॥

तड़पत तनु तनि तरबतर, तरुनाई तति तर्क ।
लाल नैन बिन सैन के, अंग नोचते *कर्क ॥
*केकड़ा
मदिरा सवैया 
नंग-धडंग अनंग-रती *अकलांत अनंद मनावत हैं ।
रंग बसंत अनंत चढ़ा शर चाप चढ़ाय चलावत हैं ।  
लाल हरा हुइ जाय धरा नभ नील सफ़ेद दिखावत हैं ।
अंग अनेकन अर्थ भरे लुकवावत हैं रँगवावत  हैं ॥
*ग्लानि-रहित

सम-लैंगिकता खुश हुई, बोले जय सरकार -


(ब्वायज-मेस की चर्चा पर आधारित )

लड़के भूले नैनसुख, प्रेम-धर्म तकरार। 

सम-लैंगिकता खुश हुई, बोले जय सरकार । 
 

  बोले जय सरकार, चले वो गली छोड़ के । 

अफ़साना नाकाम,  मजे में मोड़ मोड़ के । 


जमानती नहिं जुल्म, व्यर्थ झंझट में पड़के । 

हवालात की बात, गए घबरा से लड़के ॥ 

Tuesday, 19 March 2013

मुर्दा मुद्दा जिया, हिलाता देश तमिलियन

मिलियन घपले से डिगी, कहाँ कभी सरकार । 
दंगे दुर्घटना हुवे, अति-आतंकी मार । 

अति-आतंकी मार, ख़ुदकुशी कर्जा कारण । 
मँहगाई भुखमरी, आज तक नहीं निवारण । 

काला भ्रष्टाचार, जमा धन बाहर बिलियन । 
मुर्दा मुद्दा जिया, हिलाता देश तमिलियन ॥  



पहलवान हो गधा, बाप अब कहे सियासत -

बेचारा रविकर फँसा,  इक टिप्पण आतंक ।
जैसे बैठा सिर मुड़ा, ओले पड़ते-लंक ।  

ओले पड़ते-लंक, करुण कर गया हिमाकत ।
पहलवान हो गधा, बाप अब कहे सियासत

बेनी जाती टूट,  किंवारा खुलता सारा ।

दिखता पर्दा टाट,  हुआ चारा बे-चारा ।

इन्ज्वायिंग मेजोरिटी, बोल गई सरकार-




किडनी डी एम के गई, वेंटीलेटर पार । 
इन्ज्वायिंग मेजोरिटी, बोल गई सरकार । 
बोल गई सरकार, बहुत आनंद मनाया । 
त्राहि त्राहि इंसान,  देखना भैया भाया । 
सत्ता का आनंद, हाथ की खुजली मिटनी । 
हाथी सैकिल बैठ, लूट लाएगा किडनी । 



किसको चुनें:-वह मारे इक बार, रोज मत मरना यारा-

यारा हत्यारा चुनो, धूर्त लुटेरे दुष्ट |
टेरे माया को सदा, करें बैंक संपुष्ट |


करें बैंक संपुष्ट, बना देंगे भिखमंगा |
मर मर जीना व्यर्थ,  विदेशी
नाचे नंगा |

हत्यारा तो यार, ख़याल रख रहा हमारा |
वह मारे इक बार, रोज मत मरना यारा ||


Sunday, 17 March 2013

किसको चुनें:-वह मारे इक बार, रोज मत मरना यारा-

यारा हत्यारा चुनो, धूर्त लुटेरे दुष्ट |
टेरे माया को सदा, करें बैंक संपुष्ट |


करें बैंक संपुष्ट, बना देंगे भिखमंगा |
मर मर जीना व्यर्थ,  विदेशी
नाचे नंगा |

हत्यारा तो यार, ख़याल रख रहा हमारा |
वह मारे इक बार, रोज मत मरना यारा ||

Saturday, 16 March 2013

करवा करवा-ता रहा , बलमा दारूबाज

करवा करवा-ता रहा , बलमा दारूबाज |
दोनों किडनी फेल हैं, सत्यवान की आज |

सत्यवान की आज , सती सावित्री चिंतित |
लेकिन पति नाराज, सिकन चेहरे पर किंचित |

बेंच खेत खलिहान, दिया घरभर को मरवा |
पति को है विश्वास , बचा लेगा यह करवा - 

Friday, 15 March 2013

नाग गले शशि गंग धरे तन भस्म मले शिथिलाय रहे-

मदिरा सवैया 

स्वारथ में कुल देव पड़े, शुभ मंथन लाभ उठाय रहे । 
 
भंग-तरंग चढ़े सिर पे शिव को विषपान कराय रहे । 
 
कंठ रुका विष देह जला शिव, पर्वत पे भरमाय रहे । 
 
नाग गले शशि गंग धरे तन भस्म मले शिथिलाय रहे ।

Thursday, 14 March 2013

कामुकता को छूट मिल गई है दो वर्षों की-

नाबालिग (18 वर्ष से कम) की सहमति से सेक्स अपराध था-
पर अब 2 वर्ष घटा दिए गए-
कामुकता को छूट मिल गई है दो वर्षों की-
वाह रे सख्त कानून 


  1. नहीं ये भी एक साजिश है , बड़े बाप के बिगडैल बेटों के लिए - अगर वह इस उम्र में अपराध करता है दंड छोटों का मिलेगा उसे बालिग़ घोषित करने सहमति नहीं बन पाई लेकिन उसको दो साल तक कुछ भी करने का दे गया क्योंकि वह बालिग़ होगा नहीं और दंड भी नहीं मिलेगा . काम बड़ों जैसे और दंड बच्चों जैसा . अभी देश प्रगति पर है तो फिर अपराध के क्षेत्र में कुछ तो प्रगति होनी ही चाहिए . कुछ सुविधाएँ मिलनी चाहिए वह दी जा रही हैं .







Wednesday, 13 March 2013

अट्ठारह सोलह लड़े, भूला सतरह साल-

अट्ठारह सोलह लड़े, भूला सतरह साल |
कम्प्रोमाइज करो झट, टालो तर्क बवाल |

टालो तर्क बवाल, आयु सतरह करवाओ  |
करो नहीं  अंधेर,  सख्त कानून बनाओ |

फास्ट ट्रैक में केस, जड़ों पे डालो मठ्ठा |
नाशों पाप समूल, बिठा मत मंत्री भट्ठा ||

Tuesday, 12 March 2013

सुनिए यह चित्कार, बुलाये रविकर पातक -

तक तक कर पथरा गईं, आँखे प्रभु जी आज |
कब से रहा पुकारता, बैठे कहाँ विराज  |

बैठे कहाँ विराज,
हृदय से सदा बुलाया । 
नाम कृपा निधि झूठ,
कृपा अब तक नहिं पाया |

सुनिए यह चित्कार, बुलाये रविकर पातक |
मिटा अन्यथा याद, याद प्रभु तेरी घातक ॥ 

Monday, 11 March 2013

साफ़ सूपड़ा कर रहा, रोज मीडिया बोल-

साफ़ सूपड़ा कर रहा, रोज मीडिया बोल । 
अर्थ हारकर खोजता, शब्दकोश को खोल । 

शब्दकोश को खोल, जरा मतलब समझाओ । 
हुई कहाँ उत्पत्ति, जरा इतिहास बताओ । 

आकर्षक यह शब्द, कमाए शब्द रोकडा । 
भाव समझ कापुरुष, अन्यथा साफ़ सूपड़ा ॥ 

 
भाये ए सी की हवा, डेंगू मच्छर दोस्त ।
फल दल पादप काटते, काटे मछली ग़ोश्त ।

काटे मछली ग़ोश्त, बने टावर के जंगल ।
टूंगे जंकी टोस्ट, रोज जंगल में मंगल ।

खाना पीना मौज, मगन मनुवा भरमाये ।
काटे पादप रोज, हरेरी ज्यादा भाये ।।


नारा की नाराजगी, जगी आज की भोर-

 नारा की नाराजगी, जगी आज की भोर । 
यह नारा कमजोर था, नारा नारीखोर । 
नारा नारीखोर, लगा सड़कों पर नारा । 
नर नारी इक साथ, देश सारा हुंकारा। 
कर के पश्चाताप, मुख्य आरोपी मारा । 
  नेता नारेबाज, पाप से करो किनारा ॥ 

Sunday, 10 March 2013

कुण्डलिया : नरेन्द्र मोदी की तरफ से-


हमने भी की गलतियाँ, मिले शर्तिया दंड |
शिकायतें भी हैं कई, किन्तु नहीं उद्दंड |

किन्तु नहीं उद्दंड, सिपाही भारत माँ का |
सेवा करूँ अखंड, करे ना कोई फांका |

सभी हाथ को काम, ग्रोथ नहिं देंगे कमने | 
स्वास्थ्य सुरक्षा शान्ति, शपथ दुहराई हमने ||

Saturday, 9 March 2013

बोल गया परवेज, परेशां पाकी बटके -


लटके झटके पाक हैं, पर नीयत नापाक |
ख्वाजा के दरबार में, राजा रगड़े नाक |

राजा रगड़े नाक, जियारत अमन-चैन हित |
हरदम हावी फौज, रहे किस तरह सुरक्षित |

बोल गया परवेज, परेशां पाकी बटके |
सिर पर उत तलवार, इधर कुल मसले लटके || 

Friday, 8 March 2013

लिए नौ लखा हार, सुरक्षा घेरा तोड़े -


छोड़े सज्जन शॉर्टकट, उधर भयंकर लूट |
देर भली अंधेर से, पकड़ें लम्बा रूट |

पकड़ें लम्बा रूट, बड़ी सरकार निकम्मी |
चुनो सुरक्षित मार्ग, सिखाते पापा मम्मी |

लिए नौ लखा हार, सुरक्षा घेरा तोड़े |
बाला लापरवाह, लुटा करके ही छोड़े || 

कर इनको आजाद, अन्यथा तोड़े खूंटा -


हारा कुल अस्तित्व ही, जीता छद्म विचार |
वैदेही तक देह कुल, होती रही शिकार |

होती रही शिकार, प्रपंची पुरुष विकारी |
चले चाल छल दम्भ, मकड़ जाले में नारी |

सहनशीलता त्याग, पढाये पुरुष पहारा |
ठगे नारि को रोज, झूठ का लिए सहारा ||



हदे पार करते रहे, जब तब दुष्टाबादि |
*अहक पूरते अहर्निश, अहमी अहमक आदि |

अहमी अहमक आदि, आह आदंश अमानत |
करें नारि-अपमान, इन्हें हैं लाखों लानत |

बहन-बेटियां माय, सुरक्षित प्रभुवर करदे |
नाकारा कानून  व्यवस्था व्यर्थ ओहदे ||

*इच्छा / मर्जी




हिला हिला सा हिन्द है, हिले हिले लिक्खाड़ |

भांजे महिला दिवस पर, देते भूत पछाड़ |



देते भूत पछाड़, दहाड़े भारत वंशी |

भांजे भांजी मार, चाल चलते हैं कंसी |



बड़े ढपोरी शंख, दिखाते ख़्वाब रुपहला |
  
महिला नहिं महफूज, दिवस बेमकसद महिला ||



गोया गैया गोपियाँ, गोरखधंधा गोप |
बन्धन में वे बाँध के,  मन की मर्जी थोप | 

मन की मर्जी थोप, नारि को हरदम लूटा |
कर इनको आजाद, अन्यथा तोड़े खूंटा |

वही काटते आज, जमाने ने जो बोया |
रहें कुंवारे पुरुष, अश्रु से नयन भिगोया ||


  नारि-सशक्तिकरण में, जगह जगह खुरपेंच |
राम गए मृग छाल हित, लक्ष्मण रेखा खेंच |


लक्ष्मण रेखा खेंच, नीच रावण है ताके |
साम दाम भय भेद, प्रताणित करे बुलाके |

 
अक्षम है कानून, पुलिस अपनों से हारी |
नारि नहीं महफूज, लूटते रहे *अनारी ||


सकते में हैं जिंदगी, माँ - बहनों की आज |

प्रश्न चिन्ह सम्बन्ध पर, आय नारि को लाज |


आय नारि को लाज, लाज लुट रही सड़क पर |

दब जाए आवाज, वहीँ पर जाती है मर |


कहीं नहीं महफूज, दुष्ट मिल जाँय बहकते |

बने सुर्खियाँ न्यूज, नहीं कुछ भी कर सकते ||




विष्णु-प्रिया पद चापती, है लक्ष्मी साक्षात |
उधर कालिका दाबती, रख कर शिव पर लात |

रख कर शिव पर लात, रूप दोनों ही भाये |
नारीवादी किन्तु, विष्णु पर हैं भन्नाए |


शिव के सिर पर गंग, उधर कैकेयी की हद |
इत लक्ष्मी को मिला, प्यार से विष्णु-प्रिया पद ||

Wednesday, 6 March 2013

निष्फल करना कठिन, दुर्जनों के मनसूबे -

मन सूबे से जिले से, जुड़े पंथ से लोग। 
गर्व करें निज जाति पर, दूजी पे अभियोग। 

दूजी पे अभियोग, बढ़ी जाती कट्टरता । 
रविकर सोच उदार, तभी तो पानी भरता । 

भारी पड़ते दुष्ट, देख सज्जन मन ऊबे । 
सफल निरंतर होंय, दुर्जनों के मनसूबे ॥ 


 गुर्गे-गुंडों में फँसी, फिर रजिया की जान |
जान बूझ कर जानवर, वर का कर नुक्सान |
वर का कर नुक्सान, झाड पर चढ़ा रखा है |
कह कह तुझे महान, स्वाद हर बार चखा है |
स्वार्थ कर रहे सिद्ध, पुन: कांग्रेसी मुर्गे |
नहीं जगत कल्याण, नहीं ये तेरे गुर्गे ||

Tuesday, 5 March 2013

मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता -12

सर्ग-3
भाग-1 ब
एक दिवस की बात है, बैठ धूप सब खाँय |
घटना बारह बरस की, सौजा रही सुनाय ||
 
 
 सौजा दालिम से कहे, वह आतंकी बाघ |
बारह मारे पूस में, पांच मनुज को माघ ||

सेनापति ने रात में, चारा रखा लगाय |
पास ग्राम से किन्तु वह, गया वृद्ध को खाय ||

नरभक्षी पागल हुआ, साक्षात् बन काल |
पशुओं को छूता नहीं, फाड़े मानव खाल ||

चारा बनने के लिए, कोई न तैयार |
कब से इक बकरा बंधा, महिना होवे पार ||

एक रात में जब सभी, बैठे घात लगाय |
स्त्री छाया इक दिखी, अंधियारे में जाय ||

एक शिला पर जम गई, उस फागुन की रात |
आखेटक दल के सहित, सेनापति घबरात ||

बिना योजना के जमी,  उत अबला बलवीर |
हाथों में भाला इधर, सजा धनुष पर तीर ||

तीन घरी बीती मगर,  लगा टकटकी दूर |
राह शिकारी देखते, आये बाघ जरूर ||

फगुआ गाने में मगन, गाये मादक गीत |
साया इक आते दिखी, बोली कोयल मीत ||

होते ही संकेत के,  देते धावा मार |
घोर विषैले तीर से,  होता बाघ शिकार  ||

भालों के वे वार भी, बेहद थे गंभीर ||
छाती फाड़ा बाघ की, माथा देता चीर ||

शान्ता चिंतित दिख रही, बोली दादी बोल |
उस नारी का क्या हुआ, जिसका कर्म अमोल ||

सौजा बोली कुछ नहीं, मंद मंद मुसकाय |
माँ के चरणों को छुवे, दालिम बाहर जाय ||

सौजा ने ऐसे किया, पूरा पश्चाताप |
निश्छल दालिम के लिए,  वर है माँ का शाप ||


शान्ता की शिक्षा हुई, आठ बरस में पूर |
वेद कला संगीत के, सीखे सकल सऊर || 

शांता विदुषी बन गई, धर्म-कर्म में ध्यान |
 भागों वाली बन करे, सकल जगत कल्याण ||

गुणवंती बाला बनी, सुन्दर पायी रूप |
नई सहेली पा गई, रूपा दिखे अनूप ||

अवध पुरी में दुःख पले, खुशियाँ रहती रूठ |
राजमहल में आ रहे, समाचार सब झूठ ||

कई बार आये यहाँ, श्री दशरथ महराज |
बेटी को देकर गए, इक रथ सुन्दर साज ||

रथ पर अपने बैठ कर, वन विहार को जाय |
रूपा उसके साथ में, हर आनंद उठाय ||

रमण हमेशा ध्यान से, पूर्ण करे कर्तव्य |
रक्षक बन संग में रहे, जैसे रथ का नभ्य ||

बटुक परम नटखट बड़ा, करे सदा खिलवाड़ |
शान्ता रूपा खेलती, देता परम बिगाड़ ||

फिर भी वह अति प्रिय लगे, आज्ञाकारी भाय |
शांता के संकेत पर, हाँ दीदी कर धाय ||

Sunday, 3 March 2013

जब कभी रस्ता चले । फब्तियां कसता चले-

जब कभी रस्ता चले ।
फब्तियां कसता चले ।।

जान जोखिम में मगर-
मस्त-मन हँसता  चले ।।

अब बजट में आदमी -
हो गया सस्ता चले ।।

मौत मंहगी हो गई -
हाल कुछ खस्ता चले ।।

दस किलो की बालिका 
बीस का बस्ता चले |

गुल खिलाते ही रहे 
किन्तु गुलदस्ता चले |

तेज रविकर का बढ़ा -
चाँद पर बसता चले  ॥

Saturday, 2 March 2013

मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता -11


सर्ग-3
भाग-1 अ
शान्ता के चरण
चले घुटुरवन शान्ता, सारा महल उजेर |
राज कुमारी को रहे, दास दासियाँ घेर ||

सबसे प्रिय लगती उसे, अपनी माँ की गोद |
माँ बोले जब तोतली, होवे परम-विनोद ||

कौला दालिम जोहते, बैठे अपनी बाट |
कौला पैरों को मले, हलके-फुल्के डांट ||

दालिम टहलाता रहे, करवाए अभ्यास |
बारह महिने में चली, करके सतत  प्रयास ||

हर्षित सारा महल था, भेज अवध सन्देश |
शान्ता के पहले कदम, सबको लगे विशेष ||

दशरथ कौशल्या सहित, लाये रथ को तेज |
पग धरते देखी सुता, पहुँची ठण्ड करेज ||

कौशल्या मौसी हुई, मौसा भूप कहाय |
सरयू-दर्शन का वहाँ, न्यौता देते जाय ||

एक  मास के बाद में, शान्ता रानी संग |
गए अवधपुर घूमने, देख प्रजा थी दंग ||

कौला को दालिम मिला, होनहार बलवान |
दासी सब ईर्ष्या करें, तनिकौ नहीं सुहान ||


प्रेम और विश्वास का, होय नहीं व्यापार ।
दंड-भेद से ना मिले, साम दाम वेकार ।।

स्नेह-समर्पण कर दिया, क्यों कुछ मांगे दास ?
 इच्छाएं कर दे दफ़न, मत करवा परिहास ।।

मौसा-मौसी  के यहाँ, रही शान्ता मस्त |
दौड़ा-दौड़ा के करे, कौला को वह पस्त ||

अपने घर फिर आ गई, एक पाख के बाद |
राजा ने पाया तभी, महा-मस्त संवाद ||

प्रथम चरण की धमक के, लक्षण बड़े महान |
हैं रानी चम्पावती,  इक शरीर दो जान ||

हर्षित भूपति नाचते, बढ़ा और भी प्यार |
ठुमक-ठुमक कर शान्ता, होती पीठ सवार ||

पैरों में पायल पड़े, झुन झुन बाजे खूब |
आनंदित माता पिता, गये प्यार में डूब ||

शान्ता माता से हुई, किन्तु तनिक अब दूर |
पर कौला देती उसे, प्यार सदा भरपूर ||

राजा भी रखते रहे, बेटी का खुब ध्यान |
 अंगराज को मिल गई, एक और संतान ||

रानी पाई पुत्र को, शान्ता पाई भाय |
देख देख के भ्रात को, मन उसका हरसाय ||

नारी का पुत्री जनम, सहज सरलतम सोझ |
सज्जन रक्षे भ्रूण को, दुर्जन मारे खोज ||

नारी  बहना  बने जो, हो दूजी संतान
होवे दुल्हन जब मिटे, दाहिज का व्यवधान ||

नारी का है श्रेष्ठतम, ममतामय  अहसास |
बच्चा पोसे गर्भ में,  काया महक सुबास ||

 कौला भी माता बनी , दालिम बनता बाप |
पुत्री संग रहने लगे, मिटे सकल संताप ||

फिर से कौला माँ बनी, पाई सुन्दर पूत |
भाई बहना की बनी, पावन जोड़ी नूत ||

शान्ता होती सात की, पांच बरस का सोम |
परम बटुक छोटा जपे, संग में सबके ॐ ||

कौला नियमित लेपती, औषधि वाला तेल |
दालिम रक्षक बन रहे, रोज कराये खेल ||

जबसे शान्ता है सुनी, गुरुकुल जाए सोम |
गुमसुम सी रहने जगी, प्राकृत हुई विलोम ||

माता से वह जिद करे, जाऊँगी उस ठौर |
भाई के संग ही रहूँ, यहाँ रहूँ ना और ||

माता समझाने लगी, कौला रही बताय |
यहीं महल में पाठ का, करती आज उपाय ||

गुरुकुल से आये वहाँ, तेजस्वी इक शिष्य |
सुधरे शांता संग ही, रूपा-बटुक भविष्य ||

दीदी का होकर रहे, कौला दालिम पूत |
 रक्षाबंधन में बंधे, उसको पहला सूत ||

बाँधे भैया सोम के, गुरुकुल में फिर जाय |
प्रभु से विनती कर कहे, हरिये सकल बलाय ||

दालिम को मिलती नई, जिम्मेदारी गूढ़ |
राजमहल का प्रमुख बन, हँसता जाए मूढ़ ||

दालिम से कौला कही, सुनो बात चितलाय |
भाई को ले आइये, माँ को लो बुलवाय ||

सुख में अपने साथ हों, संग रहे परिवार |
माता का आभार कर, यही परम सुविचार ||

संदेसा भेजा तुरत, आई सौजा पास |
बीती बातें भूलती, नए नए एहसास ||

छोटा भाई भी हुआ, तगड़ा और बलिष्ठ |
दालिम सा दिखता रमण, विनयशील अति-शिष्ट ||

रमण सुरक्षा हित चला, शान्ता पास तुरन्त |
 रानी माँ भी खुश हुई, देख शिष्ट बलवंत ||

सौजा रूपा बटुक का, हर पल रखती ध्यान |
रानी की सेवा करे, कौला इस दरम्यान ||

राज वैद्य आते रहे, करने को उपचार |
चार बरस में मिट गए, सारे अंग विकार ||


दिनेश चन्द्र गुप्ता ,रविकर वरिष्ठ तकनीकी सहायक
   इंडियन स्कूल ऑफ़ माइंस धनबाद झारखण्ड पिता:  स्व. सेठ लल्लूराम जी गुप्ता 
   माता : स्व. मुन्नी देवी   
 धर्म-पत्नी : श्रीमती सीमा गुप्ता  
सुपुत्र : कुमार शिवा ( सहायक प्रबंधक , TCIL,  नई  दिल्ली  )  
सुपुत्री : 1. मनु गुप्ता (ASE, TCS लखनऊ ) 2. स्वस्ति-मेधा ( B Tech केमिकल इंजी )
(ग्रीन वैली -शिमला -कुफरी )
जन्म स्थान : पटरंगा मंडी  जिला फैजाबाद  उत्तर प्रदेश
जन्म तिथि : 15 अगस्त 1960

Friday, 1 March 2013

काव्य रचे मतिमंद, मिले जो गुरुवर साँचा-


 साँचा नाचा चतुर्दिक, शब्द अब्द कटि चोज । 
चुने चुनिन्दा चुनरियाँ, सोहै ओज उरोज |

सोहै ओज उरोज, रोज अभ्यास निरंतर |
दूर करे त्रुटि खोज, करे निर्मल तनु-अंतर |

भरे भाव रस छंद, बचे नहिं खाली खाँचा |
काव्य रचे मतिमंद, मिले जो गुरुवर साँचा ||
*चोज=सुभाषित /मजाकिया बात



होता स्वाहा बोल के, समिधा देता डाल ।
खुश होता जब देव वह, देता दुगुना माल ।

देता दुगुना माल , यहाँ पतझर का स्वाहा ।
धरती पर हरसाल, होय वासंतिक हा हा ।

परिवर्तन का दौर, लगा ले भैया गोता ।
जो चाहे प्रभु राम, वही तो हरदम होता । ।