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Tuesday, 25 June 2013

ज़िंदा लेते लूट, लाश ने जान बचाई -




खानापूरी हो चुकी, गई रसद की खेप । 
खेप गए नेता सकल, बेशर्मी भी झेंप । 

बेशर्मी भी झेंप, उचक्कों की बन आई । 
ज़िंदा लेते लूट, लाश ने जान बचाई । 

भूखे-प्यासे मौत, उठा दुनिया से दाना ।
रहे दुबारा न्यौत, बने फिर मुर्दाखाना ॥



नंदी को देता बचा, शिव-तांडव विकराल । 
भक्ति-भृत्य खाए गए, महाकाल के गाल । 
 

महाकाल के गाल, महाजन गाल बजाते । 

राजनीति का खेल, आपदा रहे भुनाते । 
 

आहत राहत बीच, चाल चल जाते गन्दी । 

हे शिव कैसा नृत्य, बचे क्यूँ नेता नंदी ॥


तप्त-तलैया तल तरल, तक सुर ताल मलाल ।

ताल-मेल बिन तमतमा, ताल ठोकता ताल ।


ताल ठोकता ताल, तनिक पड़-ताल कराया ।

अश्रु तली तक सूख, जेठ को दोषी पाया ।


कर घन-घोर गुहार, पार करवाती नैया ।

तनमन जाय अघाय, काम रत तप्त-तलैया ।
तक=देखकर

 



13 comments:

  1. अत्युत्तम!
    सभी कुण्डलिया बहुत बढ़िया है।

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  2. छप्पय छंद और अलंकारों का कौशल सराहनीय है !

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  3. सॉरी ,
    आपके अनुप्रास के प्रभाव में कुंडलिया की जगह छप्पय लिख गई!

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  4. सभी कुण्डलियाँ प्रभावी .... त्रासदी को हूबहू बयाँ करती ...

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  5. आपकी यह रचना कल गुरुवार (27-06-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

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  6. काश की राजनीति करने वाले आम मददगार इंसान की तरह केदारनाथ जाकर कुछ खुद मदद समझ पाते की आम जन का दुःख दर्द क्या होता है ....
    सार्थक मर्मस्पर्शी प्रस्तुति

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  7. सर, बहुत ही सामयिक व मर्मस्पर्शी कुण्डलियाँ लिखीं है आपने ..

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  8. उत्कृष्ट संजीदा और सामयिक कुण्डलियाँ .बहुत बहुत बधाई...

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  9. वाह क्या सटीक बातें कही हैं आपने, मज़ा आगया पढ़कर।
    बेहद प्रभाव शाली रचना...आभार

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  10. क्या कहने हैं अभिव्यक्ति के बिम्ब के .अर्थ और भाव के सब कुछ के सार के .

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