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Tuesday, 19 March 2013

मुर्दा मुद्दा जिया, हिलाता देश तमिलियन

मिलियन घपले से डिगी, कहाँ कभी सरकार । 
दंगे दुर्घटना हुवे, अति-आतंकी मार । 

अति-आतंकी मार, ख़ुदकुशी कर्जा कारण । 
मँहगाई भुखमरी, आज तक नहीं निवारण । 

काला भ्रष्टाचार, जमा धन बाहर बिलियन । 
मुर्दा मुद्दा जिया, हिलाता देश तमिलियन ॥  



पहलवान हो गधा, बाप अब कहे सियासत -

बेचारा रविकर फँसा,  इक टिप्पण आतंक ।
जैसे बैठा सिर मुड़ा, ओले पड़ते-लंक ।  

ओले पड़ते-लंक, करुण कर गया हिमाकत ।
पहलवान हो गधा, बाप अब कहे सियासत

बेनी जाती टूट,  किंवारा खुलता सारा ।

दिखता पर्दा टाट,  हुआ चारा बे-चारा ।

8 comments:

  1. सही बात है, इस तमिलियन ने भी सही मौक़ा ताड़ा है। गुप्त समझौता हो जाने पर पुन समर्थन बहाल कर देंगे। किन्तु सवाल वही देश हितों का क्या ?

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  2. बहुत सुन्दर रचना!
    http://voice-brijesh.blogspot.com

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  3. बहुत सुन्दर ...
    पधारें "चाँद से करती हूँ बातें "

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