Follow by Email

Wednesday, 30 May 2012

रचे रचना जो फाडू-


ताड़ी पी रविकर लिखे, कागद रंगता जाय |
एग्रीगेटर की कृपा, दस में तीन छपाय |

दस में तीन छपाय, रचे रचना जो फाडू |
नो एक्सेस श्रीमान, जाय के खीसी काढूं |

काले अक्षर भैंस,  हमारी काली वाणी |
तारकोल के पेज, यही तो दुनिया ताड़ी ||



हमारी वाणी पर नहीं प्रकाशित हो पाए दो ब्लॉग-पोस्ट-

दिनेश की टिप्पणी - आपका लिंक

"उच्चारण" पर हाय, पड़े गर्दन पर फंदा-


"महँगाई-छः दोहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



मुंह की और मसूर की, लाल लाल सी दाल |
डाल-डाल पर बैठकर, खाते रहे दलाल |

खाते रहे दलाल, खाल खिंचवाया करते |
निर्धन श्रमिक किसान, मौत दूजे की मरते |

"उच्चारण" पर हाय, पड़े गर्दन पर फंदा |
सिसक सिसक मर जाय, आज का सच्चा बंदा ||



तभी पढ़ें जब आपके पास प्रमाण-पत्र हो !



चना अकेला चल पड़ा, खड़ा बीच बाजार |
ताल ठोकता गर्व से, जो फोड़ा सौ भार |

जो फोड़ा सौ भार, लगे यह लेकिन सच ना |
किन्तु रहे हुशियार, जरा घूँघट से बचना |

केवल मुंह को ढांप, निपटती प्रात: बेला |
सरे-शाम मैदान, सौंचता चना अकेला ||



घूँघट बुर्का डाल के, बैठ चौक पर जाय |
टिकट ख़रीदे क्लास जो, वो ही दर्शन पाय |

वो ही दर्शन पाय, आपकी  मेहरबानी  |
रविकर सा नाचीज, ढूँढिये बेहतर जानी |


सज्जन का क्या काम, निमंत्रित कर ले मुंह-फट |
दो सौ डालर डाल, उठा देंगे वे घूँघट ||


कौआमन अपने गिलहरी मित्रसे यूँ बोला तू चल मै पढता हूँ धीरे-धीरे बढता हूँ , टेबलपर मै बैठा हूँ बाइकपर बस चढ़ता हूँ मेरे हिस्से की फसल बह गई ! मन की बतिया मन में रह गई !!


मन-रेगा तन-रेगा -

(1)
मन-रेगा रेगा अरे, तन रेगा खा भांग  | 
रक्त चूस खटमल करें, रक्तदान का स्वांग |

रक्तदान का स्वांग, उदर-जंघा जन-मध्यम |
उटपटांग दो टांग, चढ़े अनुदानी उत्तम |

पर हराम की खाय, पाँव हाथी सा फूला |
जन जीवन अलसाय, तथ्य हर गाँव कबूला ||


(2)

रेगा होते जा रहे, लाभुक और मजूर |
बैठ कमीशन खा रहे, बिना काम भरपूर |
http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/9/91/Kettenbagger_CAT_325C_LN.jpeg
बिना काम भरपूर, मशीनें करैं खुदाई |
चढ़े चढ़ावा दूर, कहीं कागदे कमाई |


वैसे ग्राम-विकास, करे यूँ खूब नरेगा |
किन्तु श्रमिक अलसात, खेत-घर आधे रेगा ||

Thursday, 24 May 2012

दस जन, पथ पर डोलते, करके ढीली डोर -

 
कठपुतली बन नाचते, मीरा मोहन-मोर |
दस जन, पथ पर डोलते, करके ढीली डोर ||

कौतुहल वश ताकता, बबलू मन हैरान |
*मुटरी में हैं क्या रखे, ये बौने इन्सान ??
*पोटली

बौने बौने *वटु बने, **पटु रानी अभिजात |
कौतुकता लख बाल की, भूप मंद मुस्कात ||
*बालक **चालाक

राजा रानी दूर के, राजपुताना आय |
चौखाने की शाल में, रानी मन लिपटाय ||

भूप उवाच-
कथ-री तू *कथरी सरिस, क्यूँ मानस में फ़ैल ?
चौखाने चौसठ लखत, मन शतरंजी मैल ||
*नागफनी / बिछौना

बबलू उवाच-
हमरा-हुलके बाल मन, कौतुक बेतुक जोड़ |
माया-मुटरी दे हमें, भाग दुशाला ओढ़ ||

Sunday, 20 May 2012

हत्या से भली भ्रूण हत्या-

कुंडली 
लकड़ी कमने लग पड़ी, चिंतातुर इंसान |
बकड़ा-बकड़ी पर सदा, चाबें अंकुर-*नान ||
*नन्हीं
चाबें अंकुर-नान, तर्क भी देते घटिया |
दोगे घर में फूंक, बेंच दोगे जा *हटिया |
*बाजार
बनमाली को त्रास, व्यर्थ क्यूँ देना प्यारे |
खाकर करता मुक्त, काम आ गए  हमारे ||


आखिर जलना अटल, बचा क्यूँ रखे लकड़ियाँ -

Young girl sitting on a log in the forest
जलें लकड़ियाँ लोहड़ी, होली बारम्बार ।
जले रसोईं में कहीं, कहीं घटे व्यभिचार ।

कहीं घटे व्यभिचार, शीत-भर जले अलावा ।
भोगे अत्याचार,  जिन्दगी विकट छलावा ।

रविकर अंकुर नवल, कबाड़े पौध कबड़िया ।
आखिर जलना अटल, बचा क्यूँ रखे लकड़ियाँ ।।
Lohri
लकड़ी काटे चीर दे, लक्कड़-हारा रोज ।
लकड़ी भी खोजत-फिरत, व्याकुल अंतिम भोज ।
http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/f/f9/Sati_ceremony.jpg

Friday, 18 May 2012

लम्बी-चौड़ी हाँकते, बौने बौने लोग-

(1)
ऊँचा-ऊँचा बोल के, ऊँचा माने छूँछ |
भौंके गुर्राए बहुत, ऊँची करके पूँछ |

ऊँची करके पूँछ, मूँछ पर हाथ फिराए |
करनी है अति-तुच्छ, ऊँच पर्वत कहलाये |

किन्तु सके सौ लील, समन्दर इन्हें समूचा | |
जो है गहरा शांत, सभी पर्वत से ऊँचा ||

(2)
पर्वत की गर्वोक्ति पर, धरा धरे ना धीर |
चला सुनामी विकटतम, सागर समझे पीर |

सागर समझे पीर, किन्तु गंभीर नियामक |
पाले अरब शरीर, संभाले सब बिधि लायक | 

बड़वानल ले थाम, सुनामी की यह हरकत |
करे तुच्छ एहसास, दहल जाता वो पर्वत |।


(3)
तथाकथित उस ऊँच को, देता थोडा क्लेश |
शान्त समन्दर भेजता, मानसून सन्देश | 


मानसून सन्देश, कष्ट में गंगा पावन |

जीव-जंतु हलकान, काट तू इनके बंधन |

ब्रह्मपुत्र सर सिन्धु, ऊबता मन क्यूँ सबका  ?
अपना त्याग घमंड, दुहाई रविकर रब का ||  



(4)


तप्त अन्तर है भयंकर |
बहुत ही विक्षोभ अन्दर |
जीव अरबों है विचरते-
शाँत पर दिखता समंदर ||

पारसी छत पर खिलाते |
सुह्र्दजन की लाश रखकर |
पर समंदर जीव मृत से -
ऊर्जा दे तरल कर कर || 


(5)


बढ़ी समस्या खाद्य की, लूट-पाट गंभीर |
मत्स्य एल्गी के लिए, चलो समंदर तीर |


चलो समंदर तीर, भरे भण्डार अनोखा |
बुझा जठर की आग, कभी देगा ना धोखा |


सागर अक्षय पात्र, करेगा विश्व तपस्या |
सचमुच हृदय विशाल, मिटाए बढ़ी समस्या || 



(6)


लम्बी-चौड़ी हाँकते, बौने बौने लोग |
शोषण करते धरा का, औने-पौने भोग |

औने-पौने भोग, रोग है इनको लागा |
रखता एटम बम्ब, दुष्टता करे अभागा |

रविकर कर चुपचाप, जलधि के इन्हें हवाले |
ये आफत परकाल, रखे गहराई  वाले ||



(7)
धरती भरती जा रही, बड़ी विकट उच्छ्वास |
बरती मरती जा रही, ले ना पावे साँस |

ले ना पावे साँस, तुला नित घाट तौलती |
फुकुसिमी जापान, त्रासदी रही खौलती |

चेतो लो संकल्प, व्यर्थ जो आपा खोते |
मिले कहाँ से आम, जहां बबुरी-बन बोते || 

Wednesday, 16 May 2012

"नो-डिमांड" हो द्वाराचार -

http://www.mydoramac.com/wordpress/wp-content/uploads/images/e089ecdbe503_DD99/clip_image001.jpg

मरघट का सन्नाटा था कल, 

आज लगा मछली बाजार ।

File:An Brueghel the Elder-Great Fish market.jpg

जो बन्दा कल तक गम खाया,  

मना रहा नौ-नौ त्यौहार ।

Sangeet Ceremony







भकुवायल ताका करता था, 

गाता चला राग मल्हार  ।

sita vivah

बेटी का जयमाल कराया, 

"नो-डिमांड" हो द्वाराचार ।।

कौन बनाए नीड़, पेट से कोयल भारू-


 

अमलताश की पीलिमा, गुलमोहर के फूल ।
कोयल-मन भायें नहीं, अमराई को भूल  ।

अमराई को भूल, भूल ना खुश्बू पाए ।
मस्ती गई बिलाय, भला अब कैसे गाये ।

कुहुक-कुहू जब बोल, चिढा देता था बच्चा ।
बैठ आम की डाल, सुनाती गायन सच्चा ।।

Amaltas

कौआ खुद को समझता, था बेहद चालाक ।
काम निकाले मजे से, कोयल मौका ताक ।

कोयल मौका ताक, आजकल दुखी बिचारी ।
कौवे होंय हलाक, मौत अब भी है जारी ।

कौन बनाए नीड़, पेट से कोयल भारू ।
होय प्रसव की पीर, हाय अब किसे पुकारूं ।। 



 Animated Punjabi Quotes Picture Comment

Sunday, 13 May 2012

मांगें मंदी चीज, इधर दुनिया में मंदी -

मंहगाई से त्रस्त जन, असफल सब तद्-बीज ।
गुणवत्ता उत्कृष्टता, मांगें मंदी चीज ।

मांगें मंदी चीज, इधर दुनिया में मंदी ।
अर्थव्यवस्था बैठ, होय छटनी सह बंदी ।

रविकर कैसा न्याय, एक को मंदी खाई ।
निन्यान्नबे हलकान, बड़ी जालिम मंहगाई ।।

Saturday, 12 May 2012

मंदी के इस दौर में, सेक्स कोर्स प्रारंभ-

मंदी के इस दौर में, सेक्स कोर्स प्रारंभ ।
वेलेंसिया स्पेन में, पागल मानव दंभ ।

पागल मानव दंभ, होय एड्मिसन लागे ।
वेश्यावृत्ति सीख, भाग्य निज छलें अभागे ।

माता-पुत्र दलाल, पिता पुत्री छल-छंदी ।
निकृष्ट भौतिक सोच, दूर ऐसे हो मंदी ।।

Wednesday, 9 May 2012

रविकर अंकुर नवल, कबाड़े पौध कबड़िया -

Young girl sitting on a log in the forest
जलें लकड़ियाँ लोहड़ी, होली बारम्बार
जले रसोईं में कहीं, कहीं घटे व्यभिचार ।

कहीं घटे व्यभिचार, शीत-भर जले अलावा ।
भोगे अत्याचार,  जिन्दगी विकट छलावा ।

रविकर अंकुर नवल, कबाड़े पौध कबड़िया
आखिर जलना अटल, बचा क्यूँ रखे लकड़ियाँ ।।
Lohri
लकड़ी काटे चीर दे, लक्कड़-हारा रोज ।
लकड़ी भी खोजत-फिरत, व्याकुल अंतिम भोज ।
http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/f/f9/Sati_ceremony.jpg

दुकनदार बदहाल, बची चमड़ी न दमड़ी-

File:London Fire Brigade Command Unit.JPG
दमड़ी दमड़ी जल रही, दे दमकल आवाज ।
दमकल कल से है लगा, मिली सफलता आज ।
 
मिली सफलता आज, बुझा दी गल्ला-मंडी  ।
जीती दमकल टीम, अग्नि हो जाती ठंडी । 

था बीमा बिन माल, सूद अब नोचे चमड़ी ।
दुकनदार बदहाल, बची चमड़ी न दमड़ी ।।

 - next picturehttp://www.firstpost.com/wp-content/uploads/2012/03/kol_hatibaganfire-ibn.jpg

Tuesday, 8 May 2012

पाएगा ना मोक्ष, आलसी किसी हाल में -

हस्पताल में मर गया,  डूब मरा या ताल ।
मरा सड़क पर या कतल, समझा छूट बवाल |

समझा छूट बवाल, सवाली दुनिया पूछे |
आया खाली हाथ, गया क्या वापस छूछे ??

 पाएगा ना मोक्ष, आलसी किसी हाल में |
करेगा काली कोख, पुन: वो हस्पताल में ||
PATNA: The first open jail in Bihar, constructed over 80 acres of land at Buxar, is set to be inaugurated this month. It will accommodate 104 inmates, along with their dependents.
The open jail concept has been introduced in 13 states of the country to encourage good conduct and self-discipline among the prison inmates. The Buxar open jail will be the latest and the most modern among the 26 open jails in the country.
बदहवाश कैदी फिरें, अब बक्सर की जेल ।
इस बिहार सरकार से, निकला उनका तेल ।

निकला उनका तेल, जेल मैनुअल संशोधन  ।
यह परिवारिक जेल, पकाए बीबी भोजन ।

लो वापस आदेश, करे फ़रियाद बिचारे ।
हम तो आये  जेल, साब ! जी  इनके मारे।।

Monday, 7 May 2012

दुर्जन पुनुरुत्पत्ति, करे हर बार कबाड़ी-

बड़ा कबाड़ी है खुदा, कितना जमा कबाड़ |
जिसकी कृपा से यहाँ, कचडा ढेर पहाड़  | 

कचडा ढेर पहाड़,  नहीं निपटाना चाहे |
खाय खेत को बाड़, बाड़ को बड़ा सराहे |

करता सज्जन मुक्त, कबाड़ी बड़ा अनाड़ी |
दुर्जन पुनुरुत्पत्ति, करे हर बार कबाड़ी ||

Friday, 4 May 2012

छोट छोट शहरों में पैदा, बड़े बड़े शैतान -

भ्रूण भ्रान्तवश भंगकर, भटके भट भकुवान । 
पुत्र-मोहवश पापधी,  बूढ़ भये अकुलान ।

घर से मार-भगाए  बेटे  ।
बहना आगे आय समेटे  ।

छोट छोट शहरों में पैदा,  बड़े बड़े शैतान ।।  

कुंडली  
उदासीनता भ्राँतता, भटक रहे जो पैर ।
अवलोकन कर ले पुन:, करे खुदाई खैर।   

करे खुदाई खैर, बने जाते वैरागी ।
अपनों को कर गैर, बरे नफरत की आगी ।

दर्द हार गम रोग, व्यथा छल आंसू हाँसी ।
जीवन के सब तत्व, जियो फिर छोड़ उदासी ।।


Thursday, 3 May 2012

हर बार, पहले से हमें कमजोर पाओगे यहाँ -

 परदेसी बेटे से -

कंटकाकीर्ण 
उस कठिन पथ पर ।
चलता रहा गोदी उठाकर ।
अक्षरों की भीड़-भारी-  
निर्भय किया-
परिचय कराकर ।

था जीत का आनंद देता -   
खेल में खुद को हराकर । 
पहली दफा स्कूल भेजा 
बाइक  पर आगे बिठाकर ।

प्रतियोगिताएँ जीत लेते 
कठिनतम अभ्यास कर-कर ।
 आज कालेज से निकलकर -
बस गए परदेश जाकर ।

पर-साल जब परदेश से, आओगे तुम गर्मियों में।
देखोगे ये गंग-जमुना, 
और दूषित हो गई ।
कैसे पाओगे नहा ।। 

कंधे झुके चश्मा लगा , झुर्रियां बढती चली-
हड्डियाँ भी गल रहीं ।
हर बार, पहले से हमें-
कमजोर पाओगे यहाँ ।।



Wednesday, 2 May 2012

मानव है मिष्ठान, 100 th Post

कुंडली
बड़े तराजू तौलता, हलवाई फिर आज । 
पंचमेल मिष्ठान को, इक डिब्बे में साज ।

इक डिब्बे में साज, मूड में बोला हंसकर ।
मानव है मिष्ठान, तेल मैदा जल शक्कर ।

नपी-तुली हो आंच, डाल के मावा काजू ।
रंग-रूप में ढाल, तोल ले बड़े तराजू ।।
दोहे-
यहाँ बतासा घूमता, लिए शुद्धतम रूप ।
*उदक-परीक्षा में फंसे, खोवे मूल स्वरूप ।। 
*पानी में डुबाना 
लड्डू का बेसन सड़ा, चढ़ा गुलाबी रंग ।
मंगल मंगल चढ़ रहे, हनुमत के सत्संग ।।

पेड़े-बर्फी बन गए,  नकली मावा औंट ।
मक्कारी में फंस रहे, नहीं सकेंगे लौट ।।

शहर जलेबी घूमती, चली इमरती संग  ।
लार टपकती देख के, हुई दंग मन-तंग ।।

रसगुल्लों ने पी लिया, रस से भरे प्रकोष्ठ ।
शक्करपाले भटकते, लेकर सूखे ओष्ठ ।।

मजे सजे ऊँचे सदन, राम राम हर याम ।
मिले पराया माल तो, लूट खाय बेदाम ।।

मीठे में कीड़े पड़े, बिजबिजाय बद-हाल  |
 चुन के दिल्ली भेजता, देते  डेरा डाल ।। 

कुंडली  

शीरे पर तैरा करे, काली काली मैल ।
सड़ जाये जब मैल तो, बदबू जाये फ़ैल |
बदबू जाये फ़ैल, दुग्ध से कर संस्कारित |
पुन: पकाए मैल, होय बढ़िया उपचारित |
हो जाये जब सान्द्र, बना लें खुटिया-गट्टे |
बन बढ़िया स्वादिष्ट, मिठाई चख दे फट्टे ||
दोहा 
खुटिया कबसे खट रही, इकदम सस्ते दाम ।
श्रम सीकर ही मूल है, यही सतत पैगाम ।।